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साइकिल

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ये जो हमारी साइकिल है न कुछ-कुछ तुम्हारी साइकिल की तरह ही है।

इसमें भी दो पहिए हैं। पिछले पहिए में हवा है अपने आसपास की। जिससे हम साँस लेते हैं। जिसमें धुआँ भी है, जिसमें धूल भी है, और जिसमें मोगरे की खुशबू भी है। यानी जैसा जीवन आसपास है वैसा सब कुछ। पिछले पहिए पर ज़ोर ज़्यादा पड़ता है। इसलिए हवा भी थोड़ी असली होनी चाहिए न। अगले पहिए में भी हवा है पर वह चिड़िया के पंखों को छूकर लौटी हवा है। उसमें उड़ानें हैं।
एक तरह से देखोगे तो साइकिल के पिछले पहिये में ज़मीन लगी है। और अगले में आसमान। पिछले पहिये में मज़दूरों की कहानियाँ हैं जो ज़मीन में कुएँ ढूँढते फिरते हैं। और अगले पहिए में छोटे-छोटे खिलौने कुएँ बनाते कुम्हारों की कहानियाँ हैं।
पिछले पहिए में उस कुम्हार को सलाम है जिसने कहा था – पानी को नहीं पर घड़े को तो थाम सकते हैं।
साइकिल के ट्यूब असल में हवा की चप्पलें ही तो हैं। जिसने सबसे पहले जूते बनाए थे उसने हमें रास्तों पर चलना सिखाया था। ज़मीन पर हमारे पैरों की परवाह की थी ताकि हमारी आँखें आसमान देखने के लिए आज़ाद रहें।
साइकिल उसकी कहानियाँ न कहेगी तो किसकी कहेगी? इसमें एक सुरीली घण्टी भी है जो टकरावों को कम करने का एक सपना है। साइकिल में सूरज चाँदों से ज़्यादा जुगनुओं की कहानियाँ होंगी। जो अपने जीवन की रोशनी अपने भीतर से ही पैदा करते हैं।
चींटी से लेकर हाथी और हाथी से लेकर चींटी सबकी कहानी होगी साइकिल में। दुनिया जिन्हें विज्ञान, गणित, भाषा, भूगोल, यात्रा, डायरी, पत्र, चित्र, कविता जाने किन-किन नामों से जानती है।

साइकिल का पहला अंक आ चुका है। 80 रंगीन पन्नों में एक से बढ़कर एक साम्रगी। हमारे देश ही नहीं दुनिया के जाने-माने लेखकों की कलम से….खासतौर पर साइकिल के लिए लिखी गई रचनाएँ…

एक चक्र चला आ रहा है। बच्चों को रट्टू तोता बनाए रखने का।

जैसा कि हमारे निज़ाम ने हम बड़ों सालों तक बनाए रखा है। क्या हम अपने बच्चों से वैसे ही पेश आना चाहते हैं जैसे हमसे हमारी सरकारें पेश आती रही हैं? क्या हम उन्हें पैसे कमाने की मशीन में तब्दील होते चुपचाप देखते रहेंगे?

या उन्हें सवाल उठाना सिखाना चाहते हैं या उन्हें प्रेम करना सिखाना चाहते हैं …एक चींटी से एक हाथी से। क्या हम चाहते हैं कि वे दो मिनिट अपने आसपास खिले फूलों को देख सकें… अभी नीम की पत्तियाँ झड़ रही हैं उन्हें पता चले। ताकि वे कचरे को पत्तियों से अलग करके देख सकें। ….हम बता सकें कि यह धरती कितनी सुन्दर है। आखिर में यह प्रेम ही धरती को बचाएगा….

साइकिल हमारा इस चक्र के खिलाफ एक जुगनू बराबर प्रस्ताव है।