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प्लूटो किताबों की दुनिया का सबसे छोटा ग्रह है। सबसे छोटे बच्चों के लिए।

खेल में लगे बच्चों के लिए और उनकी ज़िद के सामने घोड़ा बनकर, थोड़ा झुककर दुनिया देखते सब बड़ों के लिए। जो चींटी के घुटने की मोच देखने ज़मीन पर लेट जाते हैं और जो हाथी से गले मिलने का ख्वाब देखते हैं उनके लिए। उन सबके भीतर व बाहर के बच्चे के लिए प्लूटो है। प्लूटो छिपाकर भूल गए कँचों का पता है। गुल्ली की नोंक है। लिखने से ज़्यादा पेंसिल को छीलने का शौक है। प्लूटो दोस्त का टिफिन है। जिसमें रीसेस की हींग महकती है। प्लूटो एक पत्ता है जिस पर एक कीड़े का पता लिखा है। मोहनजोदड़ो से पहले इस लिपि को पढ़ा जाना है। प्लूटो में बस्ता टाँगे बस स्टॉप तक आती माँ है। और वो बस्ता भी जिसमें उस की पीठ का पसीना है। पीटी टीचर की सीटी है। याद है न …पेंसिल पर दो पंख चिपकाकर चिड़िया बनाते थे। तभी तो हमारी पेंसिलें इतनी गुमती थीं। ये जो सारी चिड़ियाँ आज उड़ती दिखती हैं वे हमारे बचपन की पेंसिलें हैं। आसमान में जाने क्या क्या लिखती फिरती हैं।

प्लूटो बचपन का यकीन है जो हम बड़े अकसर हवा में उड़ा देते हैं।

प्रमुख रूप से 8 साल तक के बच्चों को ध्यान में रखकर प्लूटो बुनी जाती है। कविता, कहानियाँ, चुटकियाँ, पत्र तमाम विधाएँ और अपने आसपास के भरे-पूरे जीवन की झलक देखी जा सकती है। प्लूटो में पूरी पृथ्वी की झलक का सपना है। एक समावेशी दुनिया का छोटा-सा सपना है। प्लूटो नाम का यह सपना दो महीने में एक बार आता है। पर पढ़ने वाले की नींदें उड़ाकर रख देता है। इसमें मिलजुल है। सूझ है। प्रेम है। सवाल हैं। बेझिझकपन है। जीवन है। और यह सब जीवंत भाषा में हैं। हमारी आरजू़ है और सपना है और ज़िद है कि प्लूटो पाठकों का उपग्रह बने।